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भारत के महान्यायवादी एवं महाधिवक्ता | Study Notes

Posted on : June 9th 2019, 11:25 am

भारत के महान्यायवादी एवं महाधिवक्ता

संविधान में (अनुच्छेद 76) भारत के महान्यावादी के पद की व्यवस्था की गई है। वह देष का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है। भारत का महान्यायवादी श्री के के वेणुगोपाल है जिन्हें 30 जून 2017 को राष्ट्रपति ने शपथ दिलायी. इससे पहले भारत क महान्यायवादी श्री मुकुल रोहतगी थे.

Sree k.k. Venugopala

नियुक्ति एवं कार्यकाल

महान्यायावादी (अटार्नी जनरल) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। उसमें उन योग्यताओं का होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीष की नियुक्ति के लिए होती है। दूसरे षब्दों में, उसके लिए आवश्यक है कि वह भारत का नागरिक हो, उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीष के रूप में काम करने का पांच वर्शों का अनुभव हो या किसी उच्च न्यायालय में वकालत का 10 वर्शों का अनुभव हो या राष्ट्रपति के मतानुसार वह न्यायायिक मामलों का योग्य व्यक्ति हो। वह अपने पद पर राष्ट्रपति की दया तक बने रह सकता है। इसका तात्पर्य है कि उसे राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय हटाया जा सकता है। वह राष्ट्रपति को कभी भी अपना त्यागपत्र सौंपकर पदमुक्त हो सकता है। संविधान में महान्यायवादी का पारिश्रमिक तय नहीं किया गया है, उसे राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक मिलता है।

कर्तव्य एवं कार्य

भारत सरकार के मुख्य कानून अधिकारी के रूप में महान्यायवादी के निम्नलिखित कर्तव्य है -

  • राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए कानूनी मामलों पर भारत सरकार को सलाह देना।
  • राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कानूनी मामलों से संबंधित वैधानिक कर्तव्य को पूरा करना।
  • इस संबंध में संविधान या कानून द्वारा सौंपे गए कार्य को पूरा करना।

राश्ट्रपति महान्यायवादी को निम्नलिखित कार्य सौंपता है -

  • संबंधित मामलों को लेकर उच्चतम न्यायालय में भारत सरकार की ओर से पेश होना।
  • सरकार से संबंधित किसी मामले में उच्च न्यायालय में पेष होना।

अधिकार एवं मर्यादाएं

भारत के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अदालत में महान्यायवादी को पेष होने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त संसद के दोनों सदनों में बोलने या कार्यवाही में भाग लेने या दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में मताधिकार के बगैर भाग लेने का अधिकार है। राज्य के महाधिवक्ता संविधान के अनुच्छेद 165 में व्यवस्था की गई है।

नियुक्ति एवं कार्यकाल

महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा होती है। उस व्यक्ति में उच्च न्यायालय का न्यायाधीष बनने की योग्यता होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे भारत का नागरिक होना चाहिए, उसे दस वर्ष तक न्यायिक अधिकारी या उच्च न्यायालय में 10 वर्षो तक वकालक करने का अनुभव होना चाहिए। संविधान द्वारा महाधिवक्ता के कार्यकाल को निष्चित नहीं किया गया है। वह अपने पद पर तब तक बना रहता है जब तक राज्यपाल की इच्छा हो, इसका तात्पर्य है कि उसे राज्यपाल द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है। वह अपने पद से त्यागपत्र देकर भी कार्यमुक्त हो सकता है। संविधान में महाधिवक्ता के वेतन-भत्तों को भी निष्चित नहीं किया गया है। उसके वेतन-भत्तों का निर्धारण राज्यपाल द्वारा किया जाता है।

कर्तव्य एवं कार्य

राज्य में वह मुख्य कानून अधिकारी होता है। इस नाते महाधिवक्ता के कार्य निम्नवत है -

  • राज्यपाल द्वारा भेजे गए कानूनी मसलों पर सरकार को सलाह देना।
  • राज्यपाल द्वारा दी गई जिम्मेदारी के तहत कानूनी मसलों पर कार्य निश्पादन।
  • संविधान या कानून सम्मत दिए गए संबंधित कानूनी कार्यों का निश्पादन।

अपने कार्य संबंधी कर्तव्यों के तहत उसे राज्य के किसी न्यायालय के समक्ष पेष होने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त उसे विधानमंडल के दोनों सदनों या संबंधित कमेटी अथवा उस सभा में, जहां के लिए वह अधिकृत है, में बिना मताधिकार के बोलने व भाग लेने का अधिकार है। वह एक सरकारी कर्मी की श्रेणी में नही आता इसलिए उसे निजी कानूनी कार्यवाही से रोका नही जा सकता।

भारत का महाधिवक्ता

महान्यायवादी के अतिरिक्त भारत सरकार के अन्य कानूनी अधिकारी होते है। वे हैं भारत सरकार के महाधिवक्ता एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता। वे महान्यायवादी को उसकी जिम्मेदारी पूरी करने में मदद करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि महान्यायवादी का पद संविधान निर्मित है, दूसरे षब्दों में अनुच्छेद 76 में महाधिवक्ता एवं अतिरिक्त महाधिवक्ता का उल्लेख नही हैं। महान्यायवादी केन्द्रीय कैबिनेट का सदस्य नही होता।