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भारत का मुख्य न्यायादिश | For SSC, IB, Railways Study Notes

Posted on : June 9th 2019, 11:48 am

भारत का मुख्य न्यायादिश for SSC,IB,Railways

उच्चतम न्यायालय

भारतीय संविधान ने एकल न्याय व्यवस्था के तहत उच्चतम स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय व उसके अधीन उच्च न्यायालयों की स्थापना की है। न्यायालय की यह एकल व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम 1935 से ली गई और इसे केन्द्रीय एवं राज्य कानून में समान रूप से लागू किया गया। भारत के उच्चतम न्यायालय का गठन 28 जनवरी, 1950 को किया गया। यह भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत लागू संघ न्यायालय पर उतराधिकारी था। अनुच्छेद 124 से 147 तक भारतीय संविधान के भाग ट में उच्चतम न्यायालय का गठन, स्वतंत्रता, न्यायक्षेत्र,शक्तियां, व्यवस्था आदि का उल्लेख है। उच्चतम न्यायालय का गठन इस समय उच्चतम न्यायालय में 26 न्यायाधीश (एक मुख्य न्यायाधीश) हैं। मूलतः उच्चतम न्यायालय के न्या न्यायाधीषों की संख्या 8 (एक मुख्य न्यायाधीष और 7 उच्च न्यायाधीष) निष्चित थी। न्यायाधीश न्यायाधीशो की नियुक्ति: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशो की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशो एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशो की सलाह के बाद करता है। इसी तरह अन्य न्यायाधीषों की नियुक्ति भी होती है। इसमें मुख्य न्यायाधीश की सलाह आवष्यक है।

न्यायालय की योग्यता : उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीष बनने के लिए किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए।

  • उसे भारत का नागरिक होना चाहिए।
  • ( अ ) उसे किसी उच्च न्यायालय का कम से कम पांच साल के लिए न्यायाधीश होना चाहिए, या (ब) उसे उच्च न्यायालय या विभिन्न न्यायालयों में मिलाकर 10 साल तक वकील होना चाहिए, या (स) राष्ट्रपति के मत में उसे पारंगत विधिवेा होना चाहिए।
  • दीपक मिश्र (जन्म 3 अक्टूबर 1953) एक भारतीय तथा वर्तमान है। 27 अगस्त, 2017 को पूर्व मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्ति के बाद के 45वें मुख्य न्यायाधीश बने.

शपथ या वचन :

उच्चतम न्यायालय के लिए नियुक्त न्यायाधीष को अपना कार्यकाल संभालने से पूर्व राश्ट्रपति या इस कार्य के लिए उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के सामने निम्नलिखित षपथ लेनी होगी -

  • भारत के संविधान के प्रति विष्वास एवं सत्यनिश्ठा।
  • भारत की एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखना।
  • अपनी सर्वोच्च योग्यता एवं ज्ञान के साथ विष्वासपूर्वक, बिना डर एवं पक्षपात के सत्यता के अनुरूप फैसला देना।

न्यायाधीषों का कार्यकाल :

  • वह 65 वर्ष की आयु तक पद बना रह सकता है।
  • उम्र के मामले में किसी प्रष्न के उठने पर संसद द्वारा स्थापित संस्था इसका निर्धारण करेगी।
  • संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा उसे पद से हटाया जा सकता है।
  • राष्ट्रपति को वह लिखित त्यागपत्र दे सकता है।

यह रोचक है कि उच्च्तम न्यायालय के किसी न्यायाधीष पर अब तक महाभियोग नहीं लगाया जा सका है।

वेतन :

वेतन, सुविधाएं, अवकाश एवं पेंशन का निर्धारण समय-समय पर संसद द्वारा किया जाता है। लेकिन न्यायाधीष की पदावधि के दौरान कोई अलाभकारी परिवर्तन नही किया जाएगा।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीष:

राश्ट्रपति किसी न्यायाधीष को उच्चतम न्यायालय का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीष नियुक्त कर सकता है जब -

  • मुख्य न्यायाधीष का पद रिक्त हो,
  • अस्थायी रूप से मुख्य न्यायाधीष अनुपस्थित हो,
  • मुख्य न्यायाधीष अपने दायित्वों के निर्वहन में असमर्थ हो।

तदर्थ न्यायाधीश

जब कभी कोरम पूरा करने में स्थायी न्यायाधीशो की संख्या कम हो रही हो तो भारत का मुख्य न्यायाधीश किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीष को अस्थायी काल के लिए उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। ऐसा वह राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बाद ही कर सकता है।

सेवानिवृा न्यायाधीष

किसी भी समय भारत का मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के सेवानिव्रत न्यायाधीश या उच्च न्यायालय से अल्पकाल के लिए उच्चतम न्यायालय में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है। ऐसा संबंधित व्यक्ति एवं राश्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही किया जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय का स्थान संविधान ने उच्चतम न्यायालय का स्थान दिल्ली में घोषित किया। लेकिन मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार हैं कि उच्चतम न्यायालय का स्थान कहीं और नियुक्त करे लेकिन ऐसा निर्णय वह राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बाद ही ले सकता है।

उच्चतम न्यायालय की शक्तियां एवं क्षेत्राधिकार संविधान में उच्चतम न्यायालय की व्यापक शक्तियों एवं क्षेत्राधिकार को उल्लिखित किया गया है। उच्चतम न्यायालय की षक्ति एवं न्यायक्षेत्रों को निम्नलिखित तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है -

प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार -

किसी भी विवाद को जो :

  • केन्द्र व एक या अधिक राज्यों के बीच हों या
  • केन्द्र और कोई राज्य का राज्यों का एक तरफ होना एवं एक या अधिक राज्यों का दूसरी तरफ होना, या
  • दो या अधिक राज्यों के बीच। उपरोक्त संघीय विवाद पर उच्चतम न्यायालय में विशेष मूल न्यायक्षेत्र निहित है। विषेश का मतलब है किसी अन्य न्यायालय को विवादों के निपटाने में इस तरह की षक्तियां प्राप्त नही हैं। न्यायालय क्षेत्राधिकार

संविधान ने उच्चतम न्यायालयों को नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक के रूप में स्थापित किया है। उच्चतम न्यायालय को अधिकार प्राप्त है कि वह बंदी प्रत्यक्षीकरण, उत्प्रेशण परमादेष आदि न्यायाधीश जारी कर नागरिक के मूल अधिकारों की रक्षा करें। न्यायिक क्षेत्र के मामले में उच्चतम केवल मूल अधिकारों के क्रियान्वयन के संबंध में न्यायादेष जारी कर सकता है, अन्य उद्देष्य से नही, जबकि दूसरी तरफ उच्च न्यायालय न केवल मूल अधिकारों के लिए न्यायादेष जारी कर सकता है बल्कि अन्य उद्देष्यों के लिए भी इसे जारी कर सकता हैं।

पुनर्विचार क्षेत्राधिकार

पुनर्विचार न्यायक्षेत्र को निम्नलिखित चार षीर्शों में वर्गीकृत किया जा सकता है -

  • संवैधानिक मामले, संवैधानिक मामलों में उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील की जा सकती है। यदि उच्च न्यायालय इसे प्रमाणित करे कि मामले में कानून का पूरक प्रष्न निहित है।
  • दीवानी मामलेः दीवानी मामलों के तहत उच्चतम न्यायालय में किसी भी मामले को लाया जा सकता है यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित कर दे कि -
  • मामला सामान्य महत्व के पूरक प्रष्न पर आधारित है।
  • ऐसा प्रष्न है जिसका निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए।
  • अपराधिक मामलेः उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय के अपराधिक मामलों के फैसलों के खिलाफ सुनवाई उस समय करता है जब -
  • अभियुक्त को सजा-ए-मौत मिली हो और उसने इसके विरूद्ध अपील की हो।
  • यह प्रमाणित हो जाए कि संबंधित मामला उच्चतम न्यायालय में ले जाने योग्य है।
  • यदि उच्च न्यायालय में कोई अपील हो जिसके तहत आरोपी व्यक्ति की उम्र कैद या दस साल की सजा सुनाई गई हो।
  • उच्च न्यायालय खुद किसी मामले को किसी अधीनस्थ न्यायालय से लिया हो और आरोपी व्यक्ति को उम्र कैद या दस साल की सजा सुनाई गई हो।

सलाहकार क्षेत्राधिकार

संविधान (अनुच्छेद 143) राश्ट्रपति को दो श्रेणियों के मामलों में उच्चतम न्यायालय से राय मांगने का अधिकार देता है-

  • ( अ ) सार्वजनिक महत्व के किसी मसले पर कानूनी प्रष्न उठने पर।
  • ( ब ) किसी पूर्व संवैधानिक संधि, समझौते आदि समान मामलों पर किसी विवाद के उत्पन्न होने पर।

पहले मामले में उच्चतम न्यायालय अपना मत दे भी सकता है और देने से इनकार भी कर सकता है। दूसरे मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अपना मत देना अनिवार्य है। अभिलेख की अदालत अभिलेखों की अदालत के रूप में उच्चतम न्यायालय के पास दो षक्तियां हैं -

  • उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही एवं उसके फैसले सार्वकालिक अभिलेख व साक्ष्य के रूप में रखे जाएंगे।
  • इसके पास न्यायालय की अवहेलना पर दंडित करने का अधिकार है।

अदालत की अवमानना सामान्य नागरिक प्रशासन संबंधी या अपराधिक दोनों प्रकार की हो सकती है। न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति उच्चतम न्यायालय में न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति निहित है। इसके तहत वह केन्द्र व राज्य दोनो स्तरों पर विधायी ‘व कार्यकारी गतिविधियों का परीक्षण करता है। यदि इसमें उसे कोई हनन दिखता है तो इसे वह अवैध घोशित कर सकता है। न्यायिक पुनर्विलोकन की आवष्यकता निम्नलिखित के लिए है -

  • संविधान की सर्वोच्चता के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए।
  • संघीय समानता को बनाए रखने (केन्द्र एवं राज्यों के बीच संतुलन) के लिए।
  • नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए।

अन्य शक्तियां

उपरोक्त शक्तियों के अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय को कोई अन्य षक्तियां भी प्राप्त हैं -

  • यह राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति के निर्वाचन के संबंध में किसी प्रकार के विवाद का निपटारा करता है।
  • यह संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के व्यवहार एवं आचरण की जांच करता है, उस संदर्भ में जिसे राष्ट्रपति द्वारा निर्देषित किया गया है। यदि उसे दुव्यर्वहार का दोशी पाता है तो राष्ट्रपति से उसको हटाने की सिफारिश कर सकता है।
  • अपने स्वयं के फैसले की समीक्षा करने की शक्ति इसे है।
  • इसके कानून भारत के सभी न्यायालयों के लिए बाध्य होंगें।
  • यह संविधान का अन्तिम व्याख्याता है।