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Directive Principles of State Policy

Directive Principles of State Policy

निर्देशक तत्वां का स्त्रोत मूलअधिकार की तरह 1928 के नेहरू प्रतिवेदन में खोज सकते हैं। 1945 के तेज बहादुर सप्रू प्रतिवेदन में मूल अधिकारों को स्पश्ट रूप से दो भागों में बांटा गया था - न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय तथा अप्रवर्तनीय। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एम. राव ने भी सलाह दिया था कि व्यक्तियों के अधिकार को दो वर्गों में विभाजित किया जाये। वे जिन्हें न्यायालय द्वारा प्रवृृत कराया जा सके और वे जो न्यायालय द्वारा प्रवृत न कराये जा सके। उनके विचार में दूसरा वर्ग राज्य के प्राधिकारियों के लिए नैतिक उपदेष के रूप में था। उनका सुझाव प्रारूप समिति ने भी स्वीकार किया। इसके परिणामस्वरूप निर्देशक तत्व अस्तित्व में आया। निर्देशक तत्व का उद्देष्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा व्यक्ति की गरिमा और कल्याण की प्राप्ति है।

निर्देशक तत्व तथा मूल अधिकार के संबंध को लेकर न्यायालय का कुछ महत्वपूर्ण निर्णय

  • केरल शिक्षा विधेयक (1959) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मूलअधिकार और निर्देशक तत्व के बीच समन्वयकारी सिद्धान्त स्वीकार किया जाना चाहिए। दोनो को प्रभावी किये जाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • मिनर्वा मिल्स (1980) मामले में न्यायालय ने कहा कि मूल अधिकार और निर्देशक तत्व के बीच सन्तुलन संविधान की आधारिक संरचना का आवश्यक लक्षण है। मिनर्वा मिल्स के परिणााम स्वरूप् अनुच्छेद 31 ग को जोड़ने के बाद भी निर्देशक तत्व को मूल अधिकार पर प्राथमिकता नही दी जा सकती हैं। वर्तमान मे केवल अनुच्छेद 39 (ख) और 39 (ग) की मूलअधिकार का प्राथमिकता दी गयी हैं।

निर्देशक सिद्धान्त की विषेशताएं

  • राज्य की नीति निर्देशक सिद्धान्त का वर्णन संविधान के भाग-4 में (अनुच्छेद 36 से 51 तक) किया गया है। हमारे संविधान निर्माताओं ने राज्य के मार्गदर्षन के लिए नीति निदेषक सिद्धान्त को संविधान में षामिल किया है। निर्देशक सिद्धान्त बताता है कि राज्य नीतियों एवं कानूनों को बनाते समय इन्हें ध्यान में रखेगा।
  • निर्देशक सिद्धान्त का उद्देष्य ‘लोक कल्याणकारी‘ राज्य की स्थापना करना है न कि पुलिस राज्य की।
  • निर्देशक सिद्धान्त अप्रवर्तनीय है अर्थात न्यायालय द्वारा लागू नही कराया जा सकता है।
  • यद्यपि निदेषक सिद्धान्त न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय है फिर भी संवैधानिक मान्यता के विवरण में अदालत इसे देखता है।
  • आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विशयों में निर्देशक सिद्धान्त अति महत्वपूर्ण है। दषा और दिषा के आधार पर इन्हें तीन व्यापक श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया हैं।

1. समाजवादी सिद्धान्

ये सिद्धांत समाजवाद के आलोक में है। ये लोकतांत्रिक समाजवादी राज्य का खाका खीचते हैं, जिनका लक्ष्य सामाजिक एवं आर्थिक न्याय प्रदान करना है और जो लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का मार्ग प्रषस्त करते हैं। ये राज्य को निर्देष देता हैं कि -

  1. लोगों के कल्याण को सामाजिक और आर्थिक न्याय के साथ असमानता को कम करते हुए प्रोत्साहित करना और अवसर उपलब्ध करना (अनुच्छेद 38)
  2. सुरक्षित करना -
    ( अ ) सभी नागरिकों के जीवनयापन का अधिकार
    ( ब ) आम वस्तुओं का पदार्थ स्त्रोतां के तहत समान वितरण
    ( स ) धन एवं उत्पादनों के साधनों में एकरूपता
    ( द ) समान काम के लिए पुरूश व महिला को समान वेतन
    ( ई ) कर्मचारियों को स्वास्थ्य एवं उपलब्धता कराकर बच्चों से बलात श्रम करने का विरोध
    ( फ ) बच्चों के विकास के अवसर (अनुच्छेद 39)।
  3. बेरोजगारों, वृद्धों, विकलांगो को उचित षिक्षा अधिकार एवं जनसहयोग उपलब्ध कराना (अनुच्छेद 41)
  4. जन स्वास्थ्य और लोगों के रहन-सहन स्तर को उन्नत करना (अनुच्छेद 47)

2. गांधीवादी सिद्धान्त

ये सिद्धान्त गांधीवारी विचारधारा पर आधारित है। ये राश्ट्रीय आंदोलन के दौरान गांधी द्वारा पुनस्र्थापित योजनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये राज्य से अपेक्षा करते हैं -

  1. ग्राम पंचायतों का गठन और उन्हें आवष्यक षक्तियां प्रदान कर स्व-सरकार की ईकाई के रूप में कार्य करने की षक्ति प्रदान करना (अनुच्छेद 40)।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारिता के आधार पर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन (अनुच्छेद 43)।
  3. स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नषीली दवाओं, मदिरा, ड्रग के उपभोग पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 47)।

3. उदार बौद्धिक सिद्धान्त

इस श्रेणी में उन सिद्धान्तों को षामिल किया है जो स्वतंत्रता को विचारधारा से संबंधित है। ये राज्य को निर्देष देते है -

  1. सभी नागरिकों को समान सिविल संहिता के तहत पूरे देष में सुरक्षा दें (अनुच्छेद 44)।
  2. पशु चिकित्सा एवं कृषि का आधुनिक एवं वैज्ञानिक रूप से संगठन (अनुच्छेद 48)।
  3. रास्ट्रीय महत्व की घोषित धरोहरों एवं ऐतिहासिक महत्व और कलात्मक स्थानों की सुरक्षा (अनुच्छेद 49)।
  4. राज्य लोकसेवा कार्यकारिणी से न्यायपालिका का विभक्त करना ( अनुच्छेद 50)।

4. नए निदेषक सिद्धान्त

42वें संशोधन अधिनियम 1976 मेंनिर्देशक सिद्धान्तों की मूल सूची में 4 सिद्धान्त और जोड़े गए। उनकी भी राज्य से अपेक्षा रहती है -

  1. बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना ( अनुच्छेद 39)।
  2. गरीबों को निःषुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराना एवं समान न्याय को प्रोत्साहन (अनुच्छेद 39।)
  3. उद्योग प्रबंधन में कर्मचारियों के बंटवारे को बढ़ावा एवं सुरक्षा (अनुच्छेद 43 ।)
  1. पर्यावरण संरक्षण और वनों एवं अन्य जीवों को सुरक्षा कवच (अनुच्छेद 48 ।)

मूल अधिकारों एवं निर्देशक सिद्धान्तों के मध्य विभेद
मूल अधिकारनिर्देशक सिद्धान्त

  1. ये नकरात्मक हैं जैसा कि ये राज्य को कुछ मसलोंपर करने को प्रतिबंधित करते है।
  2. ये न्यायोचित होते हैं, इनमें हनन पर न्यायालय द्वारा इन्हें लागू कराया जा सकता हैं।
  3. इनका उद्देष्य देष में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना हैं।
  4. ये कानूनी रूप से मान्य हैं।
  5. ये व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन देते हैं, इस प्रकार वैयाक्तिक हैं।
  6. इनको लागू करने के लिए विधान की आवष्यकता नहीं, ये स्वतः लागू हैं।
  7. न्यायालय इस बात के लिए बाध्य हैं कि किसी भी अधिकार के हनन को वह गैर-संवैधानिक एवं अवैध घोशित करे।
    • ये सकरात्मक हैं, राज्य को कुछ मसलों पर इनकी आवष्यकता होती हैं।
    • ये गैर-न्यायोचित होते हैं। इन्हें कानूनी रूप से न्यायालय द्वारा लागू नही कराया जा सकता।
    • इनका उद्देष्य देष में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना हैं।
    • इन्हें नैतिक एवं राजनीतिक मान्यता प्राप्त हैं।
    • ये समुदाय के कल्याण को प्रोत्साहित करते हैं, इस तरह ये सामाजिक हैं।
    • इन्हें लागू रखने में एक विधान की आवष्यकता होती हैं, ये स्वतः लागू नही होते।
    • किसी निदेषक सिद्धान्त के हनन पर न्यायालय कोई मूल कानून की घोशणा नहीं कर सकता। हालांकि इनको प्रभावी बनाने के आधार पर इन्हें कानूनी मान्यता दिलाई जा सकती हैं।
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